आज यूँही अनजाने में उस रास्ते गया जहाँ ना जाने कितने झूठे वादे और झूठी कसमे खाकर मेरे वजूद को चंद लम्हों का मेहमां बना दिया..तुमने तो मुझे पा लिया पर हमने न जाने कितना कुछ खो दिया..
खोई हमने वो आँखों में प्यार की परछाई जिसमे मुहब्बत देखी थी हमने कभी, वो बहके से पल और हर कदम पे तुम्हारे साथ होने का नशा..
खोई हमने तुम्हारे उलझे जुल्फों को अपने उंगलियों से सुलझाने की कशमकश..खोई हमने:
मेरे छूने पे वो तुम्हारी आँखों में शर्म की लहरें ..
वो जमीन पे चाँद का डूबते सूरज की लालिमा से सुर्ख हो जाना ,खोई है मैने वो बारिश से भीगा बदन और साँस की तपन., खो गया वो तुम्हारा गीले कपड़ों के आड़ में लुका-छीपी खेलना मानों चांदनी रातों में चाँद की बादलों संग आवारगी.. वो तुम्हारी हँसी की गूँज और वादों से सींचा हमारा साथ भी खो दिया हमने.. और खो दिया मैनें वो हर कदम पे तेरा साथ और मेरे लड़खड़ाते कदमों को तुम्हारे बाँहों का सहारा.. तुम्हारे पैरों में वो पेजाब की अठखेलियाँ जो हर बीतते पहर झूमती गूँजती तुम्हारे करीब होने का ऐलान करती थी..ये सारे पल खो गए और दे गई वो आखिरी मुलाकात जब हमारे सारे वादे और हमारे सारे अरमानों का जनाजा तुम्हारी डोली के संग चल पड़ा.. बेशक रास्ते एक थे पर मंजिल अनजान।।
